इशारा

इशारा
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हर एक कोई अपनी जिंदगी में इतना मशगूल रहता है की कई जरूरी इशारों को भी नजरअंदाज करता रहता है।ये इशारे इंसान को उसके परिवारजन,मित्र,साथी,समाज,प्रकृति और यहां तक की ईश्वर भी करता है किन्तु सब बेकार।
फिर उपरवाला जब देखता है की कोई इशारा काम नहीं कर रहा तो वो कुछ अच्छा ,फिर उससे अच्छा और फिर और भी अच्छा करता है की कभी तो उसका ध्यान इस और जाएगा किन्तु इंसानी फितरत ही ऐसी है की सुख के समय में रुपया,पैसा,दौलत,गाडी,मकान,संपत्ति और सम्पन्नता के अभिमान में ये देख  या समज ही नहीं पाता की कोई है जिसको याद कर धन्यवाद किया जाये जो इस सम्पन्नता को दे रहा है।
लेकिन जैसे ही उसने ज़रा सी तकलीफ दी नहीं की अपना सिर पकड़ कर भगवान् से शिकायत करने लगता है की उसने ये क्या कर दिया?
इसीलिए कहा है "दुःख में सुमिरन सब करे,सुख में करे न कोय।जो सुख में सुमिरन करे , तो दुःख काहे का होय'।

परमात्मा का सदैव स्मरण और उसके इशारे को समज कर अपना कष्ट मिटाये।
श्री राम।

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